नॉन-स्टिक तवे के टेफ़लोन पर कुछ भी नही चिपकता, तो फिर टेफ़लोनको तवे पे कैसे चिपकाया जाता है ?

नॉन-स्टिक तवे के टेफ़लोन पर कुछ भी नही चिपकता, तो फिर टेफ़लोनको तवे पे कैसे चिपकाया जाता है ? 


टेफ़लोन लोगोकी ज़ुबान पर चढ़ा हुवा एक व्यापारी नाम है। रासायनिक नाम polytetrefluoro-ethylene है, जिसे शॉर्ट में PTFE कहा जाता है। यह पदार्थ 1938 में अमरिकन कम्पनी डू पोन्टके रॉय प्लंकेट नामक रसायनशास्त्रिने आकस्मिक तरीकेसे ही ढूंढा और कम्पनी ने टेफ़लोन लेबल के नीचे ट्रेडमार्क लगाकर मार्केटिंग शुरू किया। बहुत कम उपयोग के कारण मार्केट में कुछ खास निकास नही हो सका, लेकिन 1960 के दशक के अंत मे रसोई के बर्तन के लिए (खास करके तवे के लिए) उपयोगमें आने लगा। टेफ़लोन से खुराक चिपकती नही, इसलिए धीरे धीरे उपयोग बढ़ने लगा।


धातु के सामान्य तवेकी सपाटी सपाट होनेके बावजूत उसपर माइक्रोस्कोपिक उबड़-खाबड़ होती है, जिसको खुराक के कण जकड़ लेते है। डोसा बनाते समय यह उबड़-खाबड़ के कारण वह चिपक जाता है। पहली बार बनाया गया डोसा उतारने में दिक्कत होती है। 

रॉय प्लंकेट


अमरीका के रॉय प्लंकेट ने शोध कीया हुवा PTFE/ टेफ़लोन का रासायनिक बंधारण ऐसा है कि उसमें पदार्थ कहीं भी चिपकता नही और कुछ भी चिपकता नही। आण्विक संरचना फ़्लोरिन के 4 और कार्बन के 2 अणुओ से बनी हुई है। जो 6-6 के जूथ में समायोजित है। यह कार्बनकी संरचना के कारण वह मटीरियल किसी से भी बॉन्ड/ bond नही बनाता। इसके उपरांत यह रचना के कारण कार्बन के आसपास फ़्लोरिन के अणु होते है तो कार्बन का संपर्क बाहरी सतह पर किसीसे नही होता। यह बंधारण के कारण यह मटीरियल निर्लेप रहता है।


उत्पादक तवे जैसे बर्तन पर टेफ़लोन के कायमी आवरण को लगाने के लिए स्टेनलेस स्टील का गरमागरम स्प्रे करते है। यह ठंडा होने पर यह बूंदे कांटेदार आवरण का रूप ले लेती है। उसके बाद प्रवाही PTFE/ टेफ़लोन को स्प्रे किया जाता है। जितनी चाहिए उतनी परत चढ़ाई जाती है। अलग अलग प्रोसेस से एलुमिनियम पर भी परत चढ़ाई जाती है। रसप्रद बात यह है कि टेफ़लोन का आविष्कार 1938 में हुवा परंतु धातु के साथ अतूट बांध से जोड़ने का तरीका 1954 में मार्क ग्रेगोइर नामके वैज्ञानिक ने ढूंढा। 


पढ़ने के लिए धन्यवाद। आशा करता हु की यह जानकारी आपको पसंद आई होगी। कृपया शेयर जरूर करे। जय हिंद। जय भारत...

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