स्वामी विवेकानंद का संक्षिप्त जीवन

स्वामी विवेकानंद का संक्षिप्त जीवन




स्वामी विवेकानंदके पूर्वज


कोलकताके सिमुलिया विभागमे बसता दत्त कुटुंब समृद्ध,सुखी और मानमरतबानमें आगे गिना जाता था। ऐसे खानदान कुटुंबमे श्रीरामचंद्र दत्त बड़े वकील थे। उन्होंने वकालतमे अच्छी खासी कमाई की थी। एक आलीशान मकान भी बनाया था जो आज भी मौजूद है।

वकील रामचंद्र दत्त के पुत्र दुर्गाचरण बचपनसे ही वैराग्यवृतिवाले थे। साधु-सन्यासियोके भक्त थे। वह अपना ज़्यादातर समय सास्त्रोके अध्ययन और सत्संगमें बिताते थे। अपने दादाजी के बारेमे स्वामी कई बार कहते : 'मेरे पितामहने सस्त्रमर्यादाके अनुसार पुत्र प्राप्ति बाद, यौवनमे सदाके लिए गृहत्याग किया था'।


पुत्र विश्वनाथ दो तीन सालके हुए उस समय दुर्गाचरणकी पत्नी उसकी तलाश करनेके लिए उसके कोई सगेके साथ काशी जाके बसे। वह नित्यनियम से काशीविश्वनाथके दर्शनको जाते। बारिशके दिन थे। रास्तेमें कीचड़ जमा हुवा था। गंगास्नान करके वह एकबार महादेवके दर्शनके लिए जा रहेथे की अचानक वह सीढियो से पैर फिसला और मंदिरके सामनेही गिरे।
उसी समय रास्तेसे जा रहे एक सन्यासीकी नज़र उसपर पड़ी। उसने दौड़कर आके उसको संभाला। मंदिरकी सीढियो पर बिठाके चोट कहा लगी है ऐसा सन्यासीने पूछा। उतनेमें चार आंखे मिली। दोनोने एकदूसरेको पहचान लिया! वह सन्यासी दुर्गाचरण खुद ही थे। वह खुदकी पत्नी पर दूसरी बार नज़र डालें बिना ही वह सन्यासी 'माया' 'माया' कहते हुए जल्दी से चलते हुए यात्रालुओ के संघमें अदृश्य हो गए।


दुर्गाचरणके पुत्र विश्वनाथ बड़े हुए। उसने अच्छी तरहसे विद्याभ्यास किया। उस समय राजभाषा उर्दू एवम फ़ारसीका अभ्यास किया। अंग्रेज़ी पर भी काफी नियंत्रण था। कायदेका अभ्यास करके कोलकाताकी हाई कोर्टके एटर्नी बने। दादाजी रामचंद्र दत्त की तरह विश्वनाथ दत्त भी अच्छे वकील से जाने जाने लगे। उसकी अच्छी खासी कमाई थी, लेकिन उदार स्वभाव के कारण कुछ बचा नही पाते थे। कुछ भी सोचे बिना उसके पास आके जो हाथ फैलता था उसको वह खूब देते थे। उसमे व्यसनी, आलसी लोग भी थे। सगे संबंधियों भी उसके घर पड़े रहते थे। 

पिताके ऐसे स्वभाव के कारण ऐसे आलसी लोगोकी मदद करने पर पुत्र नरेंद्रनाथ ने भी एकबार विरोध किया, उस समय विश्वनाथ दत्तने कहा : 'बेटे , मनुष्य जीवन कितना दुःख मय है ये तू अभी नही समज सकते, जब तू समज पाओगे तब दुःखके पंजेसे पलभरमे छुटकारा पानेके लिए जो लोग नशा करते है, उसको दयादृष्टि से देख सकोगे।' और सहिमे, आगे जाके क्षमाशील दयादृष्टिके अनेक उदाहरण उसके जीवनमें देखनेको मिले।

श्री विश्वनाथ दत्त कलाप्रिय और रसिक थे। उसको संगीतका बहुत शौख था। वह अच्छा गाते भी थे। बाइबल और फ़ारसी कवि हाफिज की बेते उसे बहुत प्रिय थी। बाइबलके वह नित्य पाठ करते। कभी कभी हाफिजकी दर्दभरी बेते भी उसकी पत्नी,पुत्रादि को गाके सुनाते थे। बच्चोके जीवनकी तालीम देनेमें विश्वनाथ दत्त बहुत खयाल रखते थे। खुदके बच्चे निर्भय,स्वमानी एवम मौलिक बुद्धिप्रतिभा वाले बने उस तरह का बर्ताव करते। बच्चोसे कोई भूल हो तो उसको डांटने का उसका अनोखा तरीका था। 


एकबार नरेन्द्रनाथ की उसकी माता के साथ किसी बात को लेकर उग्र चर्चा हुई। माताश्री को उचे स्वर में दो चार कठिन शब्द भी सुना दिए। विश्वनाथ दत्त को इस बात का पता चला। उसने नरेन्द्रनाथ को कुछ भी नही कहा।
लेकिन उसके कमरेमे जहा नरेन्द्रनाथ उसके दोस्तो के सात उठते बैठते थे उस कमरेके दरवाजे पे बड़े अक्षरोसे लिखा: 'नरेंद्रबाबूने अपनी माताश्री से आज कुछ कठिन शब्द बोले है।' यह लिखा हुवा उसके दोस्तों ने पढ़ा और वह खूब सरमाया और उसे पश्चाताप हुवा। उसके बाद कभी भी उसने माताश्री से ऊंची आवाजमें बात नही की।


माताश्री भुवनेश्वरी देवी भगवतभक्त,बुद्धिमान,व्यवहारमें कुशल और अत्यंत स्वरुपवान थे। उसपर विशाल कुटुंबका बोझ था फिरभी वह कार्यभार शांतिपूर्वक चलते। गृहकार्यसे समय लेके वह रामायण,महाभारत आदि धर्मग्रंथ पढ़ते। उसकी यादशक्ति बहुत तीव्र थी। एक ही बार सुनी हुई बात उसे याद राह जाती थी। कई  समय पहले की बात ऐसे करते थे जेसे कलकी ही बात हो।

विश्वनाथ दत्त का अकाल मृत्यु के कारण कुटुंब पर जैसे आफत आन पड़ी, फिरभी उस वक्त भुवनेश्वरी देवीने धीरज दिखाई। वह दुःख के दिनोंमें धैर्य,सहिष्णुता,स्वमान जैसे गुण दिखाई पड़े थे। वकालत के समय की आमदनी में हज़ार दो हजार का खर्च करने वाला कुटुंबने तीस रुपएमें घर चलाया। ऐसी परिस्थितियों में भी बच्चो का भरणपोषण और विद्याभ्यास का बंदोबस्त किया। दोस्तोने और सगे संबधीओ ने भी मदद करने से इनकार करदिया। सबसे बड़े पुत्र नरेन्द्रनाथ को शिफारिश के अभाव के कारण नौकरी नही मिल पायी। आवक का कोई साधन रहा नही। कुटुंब का आधाररूप नरेन्द्रनाथ सन्यासी होनेकी तैयारी करने लगा था। ऐसे समय मे भुवनेश्वरी देवीने अद्भुत धैर्य दिखाकर कर्तव्य का पालन किया है, उसका विचार करने पर उसके चरणोमे भक्तिभाव से अपने आप मस्तक नमन हो जाता है।


भुवनेश्वरी देवी ने रामायण-महाभारत के कई भाग कंठस्थ किए थे और वह सबको सुनाते थे। गरीबो के प्रति अंतर की सहानुभूति और कर्तव्यनिष्ठा के गुण स्वामी विवेकानंद को मताजीसे वंश परंपरा से मील थे। जाती,रंग,धर्मके भेदभाव बिना समग्र मानवजाति प्रति समान प्रेमभाव के गुण भी भुवनेश्वरीदेवी जैसी आदर्श भारतीय माता से स्वामीजी को प्राप्त हुए थे।

स्वामी विवेकानंदका जन्म और बचपन


अपने कुल को उजागर करे ऐसे पुत्र की इच्छा हर माँ के मनमे स्वभाविक होती है। भुवनेश्वरी देवी के दिलमे भी ऐसे कुलदीपक पुत्रकी अभिलाषा थी। अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए भुवनेश्वरी देवीने काशीमे रहते दत्त कुटुंब के एक वृद्ध माँजी को काशीमे वीरेश्वर महादेवकी पूजा करने को कहलाया। उसके मुताबिक काशीमे महादेव की पाठ पूजा शुरू हुई। इस समाचार से भुवनेश्वरी देवी को संतोष हुवा। उसकी प्रार्थना सफल होगी ऐसी श्रद्धा उसके मनमे बैठी। वह अपने दिन पाठ पूजा और ध्यान-चिंतनमे बिताने लगे।

भुवनेश्वरी देवीका चित्त रातदिन भगवान शंकर से जुड़ा हुवा रहता। एक रात स्वप्नमे महादेवके साक्षात दर्शन हुए। मनोहर बालस्वरूप धारण करके जानेकी महादेव उसकी गोदमे बिराजे हो। भुवनेश्वरी देवी एकदमसे स्वप्न से जाग ऊठे। 'जय शंकर, जय भोलेनाथ !' ऐसा बोलते हुए अंतर मन से प्रार्थना करने लगे। उसकी इच्छा पूरी होनेका दिन नजदीक है ऐसा जानके आनंदमग्न होगये और उचित समय पर पुत्र को जन्म दिया। 

संवत १९१९ को  उगते चाँद की सप्तमी, सोमवार को सन १८६३ ,१२ जनवरी , सूर्योदय से ६ मिनट पहले महा पुरुष का जन्म हुवा। महादेवकी कृपा से पुत्र प्राप्त होनेसे माताने पुत्रका नाम 'वीरेश्वर' रखा। बादमे 'नरेन्द्रनाथ' रखा गया। 

स्वामी विवेकानंदका बचपन


स्वामी विवेकानंदका जन्म १२ जनवरी १८६३ को हुआ था। बालक नरेन्द्र नटखट और हठीले थे। कई बार वह इतना गुस्सा करते की उसको काबू करना मुश्कल मुश्किल बन जाता। धमकी या समजाने का कोई असर नही होता था। उस वख्त भुवनेश्वरी देवी एक रामबाण उपाय उसपर आज़माती। जोर से आवाज़ लगाते और उसके सिरपे ठंडा पानी डालते और कानमे धीरे से शिवका नाम बोलते, ऐसे नरेंद्र शांत हो जाता। कभी कभी भुवनेश्वरी देवी कहती 'भगवान से मैन पुत्र मांगा फिरभी उस भूतनाथ ने उसके एक भूत को ही भेज दिया।'

साधु संतोके प्रति नरेंद्रको बचपन से ही आदरभाव था। उसके घरपे भी साधु संत आते तो वह खुश हो जाता। एकबार साधुने दरवाज़े पे आके भीख मांगी। नरेन्द्र ने अपनी नई धोती देदी। भवनेश्वरी देवीको इस बात का पता चला, उसके बाद कोई साधु आते थे तो वह उसको कमरेमे बंद करदेती थी। लेकिन इस युक्ति से कोई खास फर्क नही पड़ता था। वह खिडकीसे साधु को देने वाली चीज बाहर फेकता था। बहनोको चिढ़ाने मे उसको मज़ा आता था। ऐसे नटखटपन से भी माता और बहेने भी खुश रहते थे। घरके नॉकरोमे घोडेगाडी का कोचमेन उसका पक्का दोस्त था। भविष्यमे कोचमेन बनने की उसकी तमन्ना थी।

माता उत्तम शिक्षक है। नरेन्द्र को मातासे बचपनमे जीवनमे उपयोगी तालीम मीली थी। माताश्री की गोदमे बैठकर उसने रामायण,महाभारत और कई पौराणिक कथाए सुनी थी। इस तरह माताने ही धार्मिक शिक्षणके बीज बोए थे।

बालक नरेन्द्र के मन पर राम-सीताकी भारी असर पड़ी थी। वह राम-सीताकी मिट्टीकी मूर्ति खरीद कर उसकी पूजा करता था।

एकबार नरेन्द्र और पडोसक बच्चा हरि, घरकी छत पर जाके ध्यानमे बैठे। काफी देर नरेन्द्र दिखा नही तो उसको ढूंढने लगे। और रूम के दरवाजे बंद देखकर लोगोने बाहरसे आवाज़ दी लेकिन अंदर से कोई जवाब न आने पर घबराकर दरवाज़ा तोड़ना पड़ा। देखा तो दोनों बच्चे ध्यानमे बैठे हुए थे। 

एक बार पडोसमे नरेन्द्र रामकथा सुनने गया था। वहां उसने सुना कि हनुमानजी केले के बाग मे रहते है। उस बात का इतना असर पड़ा कि नरेन्द्र हनुमानजीको ढूंढने केलेके बाग मे गया। देर रातको वह वापस घर आया तब उसकी माताने उसे आश्वासन देते हुवे कहा, 'हनुमानजी राम के कोई कामसे ओर कही गए होंगे।' यह सुनकर नरेन्द्र शांत हो गया।

इसी तरह नरेन्द्र के जीवन का घड़तर बचपनसे ही सुंदर तरीके से शुरू हुवा था। वह ६ साल का हुवा तब स्कूल मे दाखिल किया गया। पर वहा वह दूसरे बच्चो से खराब संगत होने लगी। तो उसको स्कूल से निकाल कर घरमे ही अध्यापक बुलाकर पढ़ाने की व्यवस्था की। नरेन्द्र की याद शक्ति और ग्रहण शक्ति काफी तीव्र थी। सातमे साल उसने 'मुग्धबोध' नामक संस्कृत और महाभारत एवं रामायण के कई भाग कंठस्थ किए थे।

विश्वदत नाथ बड़े वकील थे। उसके घर अलग अलग जाती के लोग आते जाते रहते थे। सबके लिए अलग अलग हुक्के रखे जाते थे। बालक नरेन्द्र को इस भेदभावका कारण समज मे नही आ रहा था। उसका कारण जानने के लिए उसने एक के बाद एक ऐसा करके सभी हुक्को से घुट ली। सभी मे एक जैसा लगा। इस बात का पता चलने पर किसीने उसे डाटा तो वह बोला, ' मैंने सभी हुक्को से दम खीचा फिरभी अलग अलग हुक्के क्यु रखे है वह मुझे समज नही आ रहा है।'

एकबार दोस्तोके साथ मस्ती करते हुए पूजा खंड के पास गिर पड़े। पत्थर से सर टकराने से आंख के ऊपर बड़ा ज़ख्म हुवा। उस घाव की निशानी ज़िन्दगी भर रही। सालो बाद श्री रामकृष्ण ने उस बात का उल्लेख करते हुए कहा था कि, 'एक अकस्मात से नरेन्द्र की थोड़ी शक्तियां नष्ट हो गई वरना उसने दुनियामे के कई उतपात मचा दी होती!'


स्वामी विवेकानंदका पाठशाला शिक्षण



बंगाल के सुप्रसिद्ध पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागरकी Metropolitan institution नामक पाठशालामे नरेन्द्रका शिक्षण शुरू हुवा। उस पाठशालामे नरेन्द्रकी असाधारण बुद्धिप्रतिभासे शिक्षक और सहपाठी उसकी ओर आकर्षित हुए और दंग रह गए। खेलकूदका नरेन्द्र भारी शोख था। नए नए खेल ढूंढ कर नरेन्द्र अपने मित्रोको आनंदित करदेता।

नरेन्द्रका स्वभाव विनोदी भी था। रामयण-महाभारत और पुराणकथाओंके प्रसंग सुनाकार सबको अनंदित करदेता। एकबार वर्ग शिक्षक पाठ ले रहे थे। उस वक्त नरेन्द्र दोस्तोके साथ बातचितमे मशगूल था। अचानक शिक्षकने सबसे सवाल पूछे। सभी छात्र बातोंमे मशगूल होने के कारण सवाल के उत्तर नही दे पाए। नरेन्द्र भी बातोंमे मशगूल था। लेकिन वह दोनों तरफ ध्यान रख सकता था। इसलिए उसने सही उत्तर दिए। इसलिए दूसरे छात्रोंको बैंच पर खड़े रहने की सज़ा दी। साथमे नरेन्द्र भी खड़ा हुवा। यह देखकर शिक्षकने कहा: 'तुम्हे खड़ा होनेकी ज़रूरत नही है। तुम्हारे उत्तर सही है।'
नरेन्द्र ने कहा: 'बाते तो में भी कर रहा था। इसलिए मुझे भी खड़ा रहना चाहिए। ऐसा कह कर वह भी खड़ा रहा।


लगभग उसी अरसेमे एक घटनासे नरेन्द्रकी धीरज और सहनशीलताकी कड़ी परीक्षा हुई। स्कूलके एक अद्यापक का स्वभाव बहुत उग्र था। वह छात्रोंको शारीरिक शिक्षा भी करते। एक बार एक छात्रको उसने बहुत पीटा। यह अमानुष मार नरेन्द्र नही देख सका और जोर से हंस पड़ा। इस वजह से अद्यापकका गुस्सा नरेन्द्र पर उतरा और वह उसे पीटने लगे। नरेन्द्रको कान पकड़ के खड़ा करने पर उसका कान मे थोड़ी चोट आई और खून निकल आया। नरेन्द्र ने गुस्से मे आकर क्रोध भरी लाल आंख से गहरी आवाज़ मे अद्यापकको कहा: 'मेरा कान क्यू खीच रहे हो? हमे मारने का आपको कोनसा अधिकार है?' 

उसी वक्त वहासे ईश्वरचंद्र विद्यासागर वहासे जा रहे थे। उन्होंने नरेन्द्रको अपने पास बुलाया। सारी हकीकत जानकर अद्यापकको डाटा और नरेन्द्रको ऑफिस मे लेजाकर शांत किया। 

श्री भवनेश्वरी देवीको इस बातका पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और नरेन्द्रको स्कूल जाने से मना कर दिया। लेकिन नरेन्द्र दूसरे दिन से स्कूल जाने लगा जैसे कुछ हुवा ही ना हो।

बचपन से ही नरेन्द्र वहम और भय से मुक्त था। उसका एक ही उदाहरण काफी है। उसके घर के पास उसका एक दोस्त रहता था। उसके आँगनमे एक पेड़ था। उसके ऊपर चढ़कर दोनों खेलते और मस्ती करते। उसके दोस्तके दादाजीको डर लगा कि बच्चे कहि गिर ना जाए। उन्होंने कहा: 'बच्चों पेड़ पर मत चढ़ना वहापे एक ब्रह्मराक्षस रहता है जो चढ़ता है उसकी गरदन मरोड़ देता है।' ऐसा बोलकर बुड्ढ़े दादाजी वहासे चले गए और नरेन्द्र पेड़ पर चढ़ने लगा। उसके दोस्तने घबराकर कहा: 'अरे नरेन, ऊपर मत चढ़ राक्षस गरदन मरोड़ देगा।' यह सुनकर नरेन्द्र खड़खडाट हंस पड़ा और बोला: 'तू एकदम मूर्ख है। अगर दादाजी की बात सच होती तो राक्षस ने कबकी मेरी गरदन मरोड़ दी होती।'


आगे ऊपर इस अनुभवकी बात करते हुवे स्वामीजी श्रोताजनो को कहते: 'पुस्तको मे लिखी है इसलिए बात को सच नही मानना, कोई कहता है इसलिए बातको सच मत मानना; खुद के प्रयत्न से सत्य खोज के निकालो वही सच मानना। वही साक्षात्कार है।'

नरेन्द्र की निर्भयता और समय सूचकता दर्शाते एक-दो किस्से उसकी किशोरावस्था मे ही बने थे। नरेन्द्र एक बार दोस्तो के साथ कोलकाता मे घूमने गया था। प्राणीबाग देखकर वह वापस एक नाव मे आ रहे थे। उतने मे नाव मे एक लड़के ने उल्टी कर दी। नाव वाले ने उसे साफ करने को कहा साफ करने के बाद ही नाव से नीचे उतारेगा ऐसा बोला। नहीतो दुगना किराया देना पड़ेगा। यह सुनकर नरेन्द्र वहां किनारे पर मौजूद अंग्रेज़ सिपाही के पास गया और टूटी फूटी अंग्रेज़ी मे सारी बात समज़ाई और गोरे सिपाही ने आकर नाव वाले को हुक़्म किया कि उन लोगो को नीचे उतार दे। और नाव वाले ने उसे जाने दिया। नरेन्द्र की इस बात से वह सिपाही भी खुश हुए। और उसके साथ नाटक देखने आने को भी कहा। नरेन्द्र उसका आभार मानकर खुश होकर दोस्तो के साथ घर गए।


एकबार नवगोपाल की व्यायाम शाला मे सभी दोस्त मिलकर एक बड़ा जूला खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे। यह साहस को लोगो की भीड़ देख रही थी। उसमे एक अंग्रेज़ नाविक था उस से नरेन्द्र ने मदद मांगी। और वह नाविक भी खुश होके मदद को आया। उतने मे अचानक से एक स्तंभ नाविक पर गिर पड़ा और वह घायल होकर बेहोश हो गया। सब भाग गए लेकिन नरेन्द्र और उसके एक दो दोस्त नही भागे। सबको लगा कि नाविक मर गया। लेकिन नरेन्द्र की हिम्मत और समय सूचकता से उस बेहोश नाविक के घाव पर अपनी धोती का कपड़ा फाड़ कर कसके बांधा। और पानी छांटकर हवा डालने लगा। उतने मे नाविक को होश आ गया और दोस्तो की मदद से नजदीक ही एक स्कूल मे उसे ले गए। और जान पहचान वाले डॉक्टर को बुलाया और उसका इलाज करवाया। और एक हफ्ते तक नरेन्द्र ने उसकी देखभाल की। बादमे वह ठीक हो गया। और बादमे दोस्तो से पैसे जोड़कर उनको दिए और प्यार से उसे विदा किया।



Swami vivekananda college study


नरेन्द्रनाथ की उम्र जैसे जैसे बढ़ती गई वैसे वैसे जीवनकी गम्भीरता भी बढ़ती गई। स्कूल के अभयास के अलावा दूसरे विषय के पुस्तक भी पढ़ने का भी भारी शोख था। लाइब्रेरी मे समाचार पत्र पढ़ना, नाटकमे हिस्सा लेना और शुद्ध भाषा बोलने जाने उसका नियम ही बन गया था। दोस्तो के साथ चर्चा करते वक्त वाद विवाद मे उसकी बुद्धि और निखरके बाहर आती थी। सत्यनिष्ठा उसके जीवनकी जड़ थी। जुठ बोलने वाले और अप्रामाणिक व्यक्ति उसे बिल्कुल भी पसंद नही थे। वह हमेशा प्रामाणिक औए सच्चे दोस्त ढूंढते थे। ऐसे दोस्तो के बिछ ही उसे आनंद आता था। 

सन १८७७ उसके पिता को व्यवसाय के सिलसिलेमे मध्यप्रदेशके रायपुर जाना हुवा। वह पहले गए और नरेन्द्र और बाकी सब बादमे आएंगे ऐसा तय हुवा। उस वक्त नरेन्द्र की उम्र १४-१५ साल थी। उस वक्त रेल सुविधा भी सभी जगह नही थी। कोलकाता से रायपुर जाने के लिए अल्लाहाबाद और जबलपुर होकर जाना पड़ता था। काफी सफर बैलगाडीमे भी करना पड़ता था। तय होने के मुताबिक नरेन्द्र और बाकी लोग रायपुर को निकले। विंध्याचल के जंगलों के बिछ से गुजरता हुवा रास्ता सौंदर्य से भरपूर था। यह सबकुछ देखकर नरेन्द्र उसमे खो गया। और बैलगाडीमे वह इस कदर सुंदरता मे खो गया कि होसमे आया तब काफी रास्ता कट गया था। यह विस्मृति का अनुभव उसका पहला अनुभव था।

रायपुर मे दो साल बीतने के बाद वह वापस कोलकाता आए। नरेन्द्र को वापस प्रवेश के लिए दिक्कत तो हुई पर तीन साल की पढ़ाई एक साल मे खत्म की। इतना ही नही प्रवेशिक परीक्षा प्रथम वर्ग मे पास की। 

इस समय दोरान नरेन्द्र ने और भी कई सारा ज्ञान प्राप्त किया था। अंग्रेज़ी और बंगाली साहित्य के कई पुस्तक उसने पढ़ लिए थे। वह परीक्षा नज़दीक आने पर ही पढ़ने लगते थे। 

सन १८८०, जनवरी से प्रेसीडेन्सी कॉलेज मे और थोड़े समय बाद स्कॉटिश चर्च कॉलेज मे अभ्यास किया। यौवन मे उसका सुडौल सरीर और बड़ी आंखे देखकर सभी मुग्ध बन जाते।

कॉलेज के अभ्यास दौरान वह ब्रह्मचर्य का चुस्तिसे पालन करते थे। 

सन १८८१ मे वह पहली बार श्री रामकृष्ण परमहंस से मिले। नरेन्द्रनाथ की कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर विलियम हेस्टी थे। वह विद्वान और तत्वचिंतक थे। वह अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाते थे। वह कहते थे नरेन्द्र जैसी भुद्धिप्रतिभा उसने कही नही देखी। वह अवश्य भावी जीवन मे झलक उठेगा।



Swami vivekananda rock memorial


अरबी समुद्र, हिंदमहासागर और बंगाल का उपसागर का जहा संगम होता है ऐसे कन्याकुमारी तीर्थ मे स्वामी विवेकानंद को एक भव्य दर्शन हुवा। इस से स्वामीजी के जीवन का मार्ग ही जैसे पलट गया। छोटा बच्चा जैसे माँ के दर्शन को दौड़ लगाता है वैसे स्वामीजी ने कन्याकुमारीमा के दर्शन के लिए दौड़ लगाई और जगदंबा के चरणों मे शाष्टांग प्रणाम किए। देवी की भावपूर्वक पूजा की और आशीर्वाद लिए।




सागर के तट से थोड़ी दूर एक खड़क था। वहा तक स्वामीजी तैरते हुए गए और उस पर बैठकर वह गहरे ध्यान मे मग्न हुए। चारो तरफ सागर के मौजे उछल रहे थे। स्वामीजी गहरे ध्यानमे सोच रहे थे। भारतमाता का समग्र चित्र उसके अंतरचक्षु समक्ष खड़ा हुवा। वह सोचने लगे: 'वह एक सामान्य परिव्राजक साधु थे? क्या मात्र बंगाल,पंजाब और महाराष्ट्र ही भारत है?' उसके अंतरमन ने जवाब दिया: 'नही, भारत छोटे बड़े प्रान्तों की सीमा से बंधा हुवा नही है। भारत की संस्कृति और भारत का लोकजीवन भारत है।' उन्होंने देखा कि भारतवासियो के दिलमे रही निर्बलता और आलस भारतीय संस्कृतिको कमज़ोर कर रही है। इस निर्बलता को दूर करना चाहिए। तब जाके प्राचीन संस्कृतिका रक्षण हो पायेगा। सच्ची धार्मिकता ही भारत का उद्धार कर सकती है।

स्वामीजी ने भारत के कई प्रांतोमे भारतभ्रमण किया था। पैदल भी फिरे थे। राष्ट्रजीवन को नजदीक से देखा था।

जिस शिला पर यह दिव्य दर्शन हुवा था। वह शिला आज 'विवेकानंद शिला' से जाना जाता है। वहा देशवासियो को याद दिलाने वाला एक भव्य स्मारक रचा हुवा है।

स्वामीजीका अलौकिक स्पर्श


नरेंद्रनाथ ने श्री रामकृष्ण के समारोह में खुद को धन्य महसूस किया।  उनकी उच्च समाधि स्थिति, ईश्वर में उनकी अनन्य आस्था, उनके प्रति भक्तों की अपार श्रद्धा, उनके अलौकिक भाषण ने नरेन्द्रनाथ को सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया, फिर भी उन्होंने श्री रामकृष्ण को अपना गुरु मानने की जल्दबाजी नहीं की।  लेकिन अचानक वह दिन करीब आ गया।





एक महीने के बाद, नरेंद्रनाथ दक्षिणेश्वर गए।  हमने नरेंद्रनाथ के अपने शब्दों को पढ़ा, उस समय के पवित्र समारोह का एक अद्भुत वर्णन: 'एक छोटे से पठार पर मैंने उन्हें अकेले बैठे देखा।  वे मुझे देखकर खुश हुए।  प्यार से बुलाया और खुद को उसके बगल में बिस्तर पर लिटा दिया।  लेकिन अगले ही पल, मैंने उन्हें आँसू में देखा।  मेरे मन में कुछ आता हुआ देखकर वे धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़े।  मेरे साथ यह हुआ कि वे पहले की तरह कुछ अजीब व्यवहार करेंगे।  लेकिन केवल निमिष ने अपना दाहिना पैर मेरी छाती पर रखा।  यह एक अजीब एहसास था जिसने मुझे अजीब महसूस कराया।  हालांकि मेरी आँखें खुली थीं, मैंने देखा कि कमरे की दीवारें और सब कुछ फीका पड़ने लगा था और लय शून्य हो गई थी।  और खुद सहित पूरी दुनिया एक सार्वभौमिक शून्य में गिरने की कगार पर थी!  मैं एकदम घबरा गया।  मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं मौत के मुंह में हूं। क्योंकि एक व्यक्ति के गायब होने पर मौत के सिवाय कुछ नहीं हो सकता।  मेरे साथ मत रहो  इसलिए मैं रोया: 'तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो!  मेरे घर पर माता-पिता हैं!  'यह सुनकर वह जोर से हँसा और मेरी छाती पर हाथ रखकर बोला: "ठीक है, अभी कुछ नहीं।  समय पर, सब कुछ किया जाएगा।  “अजीब बात यह थी कि उन्होंने कहा कि तुरंत मेरा अनुभव चला गया था।  फिर से मैं स्वस्थ हो गया।  मैंने कमरे के अंदर और बाहर सब कुछ देखा जैसे कि वह अपनी जगह पर तैनात था।


'इसका वर्णन करने में जितना समय लगता है, उससे कम समय लगता है।  लेकिन इसने मेरे दिमाग में एक बड़ी क्रांति कर दी।  बेवकूफ होने के नाते, मैंने सोचा:

यह सब क्या होगा?  इस अद्भुत मनुष्य के संकल्प के कारण ही देश आया और गया है।  मैंने सवाल करना शुरू किया कि यह सम्मोहन, चुंबकत्व - सम्मोहन के कारण हो सकता है;  लेकिन यह संभव नहीं था, क्योंकि यह कमजोर दिमाग को प्रभावित कर सकता था, और मुझे गर्व था कि मैं खुद नहीं था।  मैं उसे पागल - धूनी समझता था।  तो मेरे इस अचानक बदलाव के पीछे क्या कारण हो सकता है?  मैं किसी भी तरह का निर्णय लेने में विफल रहा।  मेरे साथ यह हुआ कि यह बहुत गहरी पहेली थी।  इसे हल करने की कोशिश नहीं करना सबसे अच्छा है।  फिर भी मैंने सावधानी बरतने का फैसला किया और उन्हें बार-बार मुझ पर ऐसी छाप छोड़ने का मौका नहीं दिया।

'एक और क्षण में मुझे आश्चर्य हुआ कि मेरे जैसे तेज दिमाग को झकझोरने वाले आदमी को पागल क्यों कहा जा सकता है!  मेरी पहली यात्रा में मेरे द्वारा दिखाए गए उत्साह के बावजूद, किसी भी व्यक्ति ने कभी भी उसे पागल नहीं समझा, लेकिन यह अभी भी मेरे दिमाग में नहीं आया, इसलिए इस अद्भुत व्यक्ति के पीछे की सच्चाई, जो मेरे अनुभव की तुलना में एक बच्चे की तरह शुद्ध और सरल लग रहा था।  मैं वास्तव में यह जानने के लिए उलझन में था।  यही वजह है कि मैं अंक पाने में असफल रहा मेरे तर्कशील दिमाग पर एक करारा प्रहार किया।  वैसे भी, मैंने इसके पीछे के रहस्य का पता लगाने का फैसला किया।  | 

'सारा दिन मेरा मन ऐसे ही विचारों में अटका रहा।  उस घटना के बाद, उसका व्यवहार फिर से बदल गया।  और पहली मुलाकात में दिखाई गई दया और भावना ने दिखाया कि, एक लंबे अंतराल के बाद, मुझे एक दोस्त या रिश्तेदार के पास जाने वाले व्यक्ति की तरह व्यवहार किया गया था।  उन्होंने मेरा स्वागत नहीं किया और मेरी देखभाल की।  मैं उनके दयालु रवैये से विशेष रूप से आकर्षित था।  आखिरकार वह दिन आ गया।  इसलिए मैंने अनुमति मांगी।  इससे उन्हें थोड़ा दुख हुआ।  उसने मुझे जल्द ही वापस जाने की अनुमति दी थी क्योंकि मैंने जल्द वापस आने का वादा किया था।  


’दो बार ऊपर के रूप में अनुभव करने के बाद, नरेंद्रनाथ ने अपने मन में फैसला किया कि श्री रामकृष्ण का प्रभाव कम नहीं होना चाहिए।  कुछ दिनों बाद, जब नरेंद्रनाथ तीसरी बार दक्षिणेश्वर आए, तो उन्हें एक ऐसा ही अलौकिक अनुभव हुआ।  उस दिन उन्हें श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर के बगल में यदुनाथ मल्लिक के बाग में ले जाया गया।  वहां रहते हुए उन्होंने नरेंद्रनाथ को स्पर्श किया।  यद्यपि नरेंद्रनाथ ने सतर्क रहने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन वह बाहर खो गया और कुछ ही मिनटों में वह अभिभूत हो गया।  कुछ समय बाद उन्होंने श्री रामकृष्ण को अपने सीने पर हाथ रगड़ते देखा।  |  

श्री रामकृष्ण ने नरेंद्रनाथ की कब्र से कई अद्भुत तथ्य सीखे।  इस संबंध में, श्री रामकृष्ण ने एक बार कहा था, “ऐसी स्थिति के दौरान मैंने उनसे कुछ प्रश्न पूछे।  मैं उनके वंश, उत्पत्ति, उस काम को पूछता हूं जिसका उद्देश्य वह इस दुनिया में पूरा करना चाहता था, साथ ही साथ जीवन की सीमा भी।  यह गहराई में चला गया और मेरे सवालों का सही जवाब दिया।  उनके उत्तर लगभग उनके द्वारा की गई भविष्यवाणियों के समान थे।  लेकिन वे सभी तथ्य दिलचस्प होंगे।  मुझे पता चला कि नरेंद्र एक परिपक्व, साधु संत हैं। और जिसदिन उसे इस सच्चे रूप का ज्ञान होगा उस दिन, वह स्वेच्छा से अपने शरीर का त्याग करेगा।

'इस अवसर के बाद, श्री रामकृष्ण और नरेंद्रनाथ के बीच प्रेम संबंध धीरे-धीरे बढ़ने लगे।  नरेंद्रनाथ श्री रामकृष्ण के त्याग, शुद्धता, निरंतर भक्ति के प्रति आकर्षित थे, जबकि श्री रामकृष्ण नरेंद्रनाथ की निर्भीकता, स्वार्थ, सत्यता आदि से आकर्षित थे।  नरेंद्रनाथ के लिए, श्री रामकृष्ण ने एक बार अपने कुछ भक्तों से कहा, "मैं इस लड़के में नारायण के दर्शन करता हूं।"  जब मैंने पहली बार नरेंद्र को देखा, तो मैंने देखा कि उसके पास आत्मा नहीं है।  उसके सीने को छूने के तुरंत बाद उसने होश खो दिया।  धीरे-धीरे उससे मिलने की मेरी इच्छा तेज हो गई।  तो मेरा दिल दुख रहा था और मैंने भोलानाथ (काली मंदिर के एक अधिकारी) से पूछा, “मेरे आत्म दुख का कारण क्या होगा?  और एक कायस्थ लड़के के लिए!  'भोलानाथ ने उत्तर दिया:, महा, इसका कारण महाभारत में बताया गया है कि जब एक सांवरवान का संत व्यावहारिक भूमिका निभाता है, तो उसका चीता एक गुणी मानव के संसर्ग में आनन्दित होता है।  '


विश्वधर्म परिषद - Vishwadharma Parishad





अमरीका के शिकागो शहरमे मिलनेवाली विश्व धर्म परिषदमें हिस्सा लेने दुनिया के कई देशोमें से प्रतिनिधियों आए थे। शिकागो शहर उत्साह से जिलमिला उठा था। धर्म परिषद की ओर जाने वाले रास्तो में भीड़ बढ़ गई थी। कई लोग सचमे विशाल धर्म परिषद में आए थे और कई ऐसा मानके आए थे कि उसका ही धर्म सत्य है ऐसा दुनिया को दिखाने आये थे। कई लोगोको तो ऐसा ही लगता था कि ख्रिस्ती धर्म का ही डंका दुनियामे बजेगा। क्योंकि अमरीका और यूरोप में यह धर्म ही प्रचलित था। लेकिन उन लोगो को क्या मालूम था कि हिन्दू धर्म का एक भारतीय प्रतिनिधि दुनिया को चकित करदेने वाला था!



शिकागो की आर्ट इंस्टिट्यूट नामकी विशाल इमरतमे होल ऑफ कोलम्बस खण्ड में सन 1893 में 11 सितंबर को प्रातः 10 बजे विश्व धर्म परिषद का विधिवत उदघाटन किया गया। 4000 प्रतिष्ठित प्रेक्षकों यह राह देख रहे थे कि मंच पर प्रतिनिधियो का आगमन कब होगा। आखिर वह घड़ी आ ही गयी श्रीयुत बोनी और प्रमुख कार्डिनल गिबन्स की अगवाई में दो दो की कतार में प्रितिनिधि आते दिखे। और अपनी अपनी जगह पर बैठने लगे। यह दृश्य भव्य था।



शुरुआत प्रार्थना से हुई। पहला दिन तो आभार विधि में ही खत्म हो गया। सुबह लगभग 8 व्यक्तिओ ने छोटे छोटे भाषण दिए। स्वामी जी को कहा गया तो उसने अभी नही ऐसा कहकर मना किया। दोपहर को 4 व्यक्ति ने भाषण किया। डॉ बेरोज़ ने स्वामीजी का परिचय दिया और स्वामीजी ने सरस्वती माता की स्तुति से शुरुआत की। पूरी सभा ने तालियो से स्वागत किया। दूसरे दिन अखबार में यह आया कि स्वामीजी का भाषण सर्वोत्तम था। अमरीका में स्वामीजी को लोग पहचानने लगे। उसके भाषण के शब्द केवल औपचारिक नही थे। उसमे हृदयकी अनुभूतिका बल था। स्वामीजी इस परिषद के सर्व श्रेष्ठ प्रतिनिधि साबित हुए।




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